Friday, October 26, 2012

HK ka Vadh

(अगर Hindu Mythology से कभी वास्ता नहीं पढ़ा है तो हिरन्यकश्यप और प्रह्लाद की स्टोरी यहाँ पढ़ लीजियेगा. वैसे अच्छा भी है अगर वास्ता नहीं पड़ा क्यूंकि मेरी कहानी का उस  कहानी से ज्यादा वास्ता नहीं है. Inspired है थोड़ी बस. वैसे for due credits इस  पोस्ट का आईडिया शिव मिश्र जी के एक उम्दा देवी अहिल्या पर के पोस्ट से आई थी. उनके ब्लॉग पर ये पोस्ट पढने के बाद जाइएगा क्यूंकि वापस आने के चांसेस कम हैं फिर. )


होलिका जल चुकी थी. हिरण्यकश्यप को बड़ा कटा कटा सा प्रतीत हो रहा था. और इसके आगे हम हिरण्यकश्यप को HK के नाम से पुकारेंगे. पूरा नाम सुनना है तो इस युग के उत्पाद की कहानी क्यूँ सुन रहे हैं? जाकर वेद-पुराण बांचिये. या फिर ज्यादा शौक है तो श्री लंका के क्रिकेट खिलाडियों के नाम याद कीजिये.

ज्यादा दुःख था नहीं वैसे HK को होलिका के मरने का . थोडा vindictive सा ही फील कर रहा था. बड़ी आई थी सुपरमॉडल . दो दिन पहले ही ब्रह्मा-मॉल से फायर-प्रूफ दुपट्टा ले कर आई थी. प्रहलाद को लेकर टेस्टिंग करने गयी थी. अब ब्रह्मा-मॉल में कोई चीज़ foolproof थोड़े न मिलती है ? कोई वरदान भी खरीदो तो स्टार लगा कर कंडिशन एप्लाई लिखा होता है. गोया अगर उस ज़माने में blood bank का  concept होता तो थोड़े न रक्तबीज वैसे खून से पैदा होने का वरदान लेता?

HK ने इन सब से सबक लेकर ज्यादा से ज्यादा पैसे खर्च कर के वरदान खरीदा था. न दिन में, न रात में. न मानव के द्वारा, न देव के द्वारा और न पशु के हाथों. न घर में न बाहर. न अस्त्र से न शस्त्र से. आज कि तारीख में ऐसा माँगा होता तो नरसिंह कि जगह सिद्धु को आना पड़ता अपनी जोक्स कि पोटली ले कर HK को मारने.

तो ऐसा था कि प्रहलाद कि धुलाई हो रही थी बाप के हाथों. तुरंत विष्णु को गुहार लगाने लगा. अब इससे हमें स्कूल कि एक घटना याद आ गयी. एक बार हमारे एक टीचर ने एक लौंडे की कुटाई  कर दी. छुट्टी होने पर मास्टर साहब बाहर निकले तो पता लगा बच्चे ने फोन करके २०-२५ मुस्टंडो कि फौज बुला रखी थी उनको सबक सिखाने के लिए. अपने बच्चों का मुंह दुबारा देखने के लिए उन्हीं बच्चों की कसम खानी पड़ी की हाथ तो छोडो, आगे से आवाज़ भी नहीं उठाएंगे. प्रहलाद से ये तो सीखा ही था हमारे सहपाठी ने. इधर दो धौल पड़े नहीं कि विष्णु विष्णु शुरू. “अरे छेत्ती छेत्ती आ बे. ये कूट रहा है. माँ दी बहन दी करनी है इसकी. जय माता दी. लेट्स रॉक.”

और विष्णु को भी तो कोई काम होता नहीं था . हमेशा राक्षसों को चूतिया बनाने के तरीके ढूंढते रहते थे. कभी नचनिया बन कर अमृत ले कर भाग जाते थे तो कभी नरसिंह बन कर आ जाते थे. और पता नहीं क्यूँ किसी खूब सोने वाले कि तुलना हमेशा कुम्भकर्ण से की जाती है. ये क्यूँ नहीं कहते कि "अबे उठ , विष्णु की तरह सोया पड़ा है.” वो भी तो 4 महीने लगातार  सोते थे. देवसुतान एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी तक. और ऐसे भंड होकर सोते थे कि पता भी नहीं चलता था की सांप के ऊपर सो रहे हैं. ये जो पूरी हमारी  mythology है न राक्षसों की बुराई करने के लिए ही लिखी गयी है. ज़रूर किसी महिला ने लिखी होगी जिसे अपने पडोसी की बुराई करने में बड़ा आनंद आता होगा.

तो प्रहलाद कि तरफ वापस आते हैं. गरज बरस कर नरसिंह अभी तक खम्भे से निकल चुके थे.

HK बोला  “ई का है.”

जवाब में नरसिंह बस गरज और गुर्रा रहे थे.

“अब का तुम्हारे लिए google translate और soundhound का बंदोबस्त करें? साफ़ साफ़ बोलो क्या बोलना है. यश चोपड़ा की नक़ल करने की ज़रूरत नहीं है.”

नरसिंह को इस बात का बुरा नहीं लगा की उन्हें यश चोपड़ा से compare किया गया. पर इस बात का भारी सदमा पहुंचा कि उन्हें उदय चोपड़ा के बाप से compare किया गया. उन्हें अब बोलना ही पड़ा.

“हम तुम्हारा वध करने आये हैं मूरख.”

“अरे पता भी है हमारी मौत पर कितने सारे clauses aur sub clauses हैं ? जाओ पूरा पढ़ कर आओ. ये मुआ प्रहलाद कहाँ गया ?”

“वो सब हमें पता है. हमारा मेकअप तो देख नासमझ.”

अब HK को  कुछ माजरा समझ आया. 

“अच्छा अच्छा. तो हमें मारना क्यूँ है? क्यूंकि हम अपने बेटे की कुटाई कर रहे हैं इसलिए ?

नरसिंह कनफुजिया गए. अब ये कौन सा अपराध है. प्रहलाद नाबालिग था . और उसपर से भारतवासी था. यहाँ पर तो बड़ों से ठुकाई का रिवाज़ है. कोई अमरीका थोड़े न है. जो child welfare जैसा कुछ होगा. वैसे भी जिस देश में राहुल गाँधी जैसे लोग अभी तक अपने आप को child  ही समझते हैं, वहां  चाईल्ड वेलफैयेर जैसी चीज़ कि क्या ज़रूरत है.

HK को समझ आया गया कि यहाँ पर वो अर्नब गोस्वामी है. फिर क्या था . चढ बैठा.

“देखो पहले एक काम करो कि जाकर पहले उसका साइन लेकर आओ जिसने बचपन में हमको ये कह कह कर धोया था कि somebody gonna get a hurt real bad . और हाँ चलो फूटो यहाँ से. इतने देर से कुंडली जमाए बैठे हो. रात हो गयी है. Clause No 3.4 पढ़ा है ना.  रात को नो एंट्री. जाओ निकलो."

नरसिंह बेचारे अपना सा मुंह लेकर चले गए. पर उन्होंने कुछ कोशिशें और भी करी. 1-2 बार वापस भी आये .  वो जैसे BJP कुछ भी कर के कांग्रेस के विरोध में रहना अपना परम कर्तव्य समझती है, वैसे ही देवतागण असुरों के against रहने को ऐसा समझते हैं . बस धर्म का के आड़ में उन्हें असुरों को  मारना ही होता है, चाहे वो बाली के सामने वामन ही क्यूँ न हों.  अब ज्यादा डिटेल में क्या बताएं, एक दिन HK ने इस दलील को कि नाखून  न अस्त्र होते हैं न शस्त्र ये मानने से इनकार कर दिया. अब हाथ में रखे रखे जानलेवा चीज़ अस्त्र  कैसे नहीं हुई ये साबित करने में नरसिंह को रात हो गयी और फिर अपना सा मुंह लेकर जाना पड़ा. फिर किसी  दिन तो HK बिलकुल धरा ही गया था कि पता चला कि HK ने चालाकी से अपनी चौखट को कटवा कर बिलकुल महीन सा कर दिया था. उसपर नरसिंह अपना बैलेंस बना ही नहीं पाए. अब हमारे नरसिंह में तब तक हमारे भारतीय राजनेता वाले jeans  नहीं आये थे, नहीं तो वो भी कुछ न कुछ सोच ही लेते. उस दिन के बाद नरसिंह लौट कर नहीं आये. प्रहलाद पिटता रहा. और जैसे ही अपने पैरों पर खड़ा हुआ और HK को लगा अब बेटा काम काज संभाल लेगा, किसी दूर के बस स्टैंड पर HK को छोड़ कर प्रहलाद चम्पत हो गया.  आखिरी दिन HK के किसी Old Age Home में कटे. अब वध न होने का वरदान  था. Natural Death  का तो नहीं था न. और प्रह्लाद का क्या था . हर घर में आज भी पाए जाते हैं. कभी पिटते हुए और कभी..

1 comment:

Anonymous said...
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